युगपुरुष कानजीस्वामी (Yugpurush Kanji Swami)
लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर / श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट, सोनगढ़
1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय
'युगपुरुष कानजीस्वामी' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक जीवन-चरित्र है। इसमें २०वीं शताब्दी के महान आध्यात्मिक क्रांतिद्रष्टा पूज्य कानजीस्वामी के जीवन, उनके संघर्ष और उनके द्वारा पुनर्जीवित किए गए 'कुन्दकुन्द के अध्यात्म' का सविस्तार वर्णन है। यह पुस्तक केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि अध्यात्म के एक नए युग का दस्तावेज़ है।
2. मुख्य विषय और अध्याय (Key Highlights)
- प्रारंभिक जीवन और दीक्षा: स्थानकवासी सम्प्रदाय में मुनि दीक्षा से लेकर उनकी सत्य की खोज की यात्रा।
- समयसार की प्राप्ति: वह ऐतिहासिक क्षण जब उन्हें आचार्य कुन्दकुन्ददेव कृत 'समयसार' प्राप्त हुआ और उनके जीवन की दिशा बदल गई।
- सोनगढ़ का उदय: दिगम्बर जैन धर्म के सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार के लिए सोनगढ़ (गुजरात) का केंद्र बनना।
- क्रांतिकारी उपदेश: 'निश्चय नय' और 'शुद्ध आत्मा' पर उनके द्वारा दिए गए क्रांतिकारी प्रवचनों का सार।
- वस्तु स्वातंत्र्य और अकर्तृत्ववाद: स्वामी जी ने कैसे समाज को 'पर' का कर्ता बनने के बोझ से मुक्त कर स्वावलंबन का मार्ग दिखाया।
- विरोध और प्रभाव: उनके सिद्धांतों के कारण हुए सामाजिक विरोध और अंततः उनके द्वारा लाई गई आध्यात्मिक जागृति।
3. पुस्तक की विशेषताएँ
- प्रमाणिक विवरण: डॉ. भारिल्ल, जो स्वयं स्वामी जी के निकट संपर्क में रहे, उन्होंने बहुत ही प्रमाणिकता के साथ घटनाओं को लिपिबद्ध किया है।
- दार्शनिक व्याख्या: जीवनी के साथ-साथ इसमें स्वामी जी के दार्शनिक दृष्टिकोण (विशेषकर निश्चय-व्यवहार का संतुलन) को गहराई से समझाया गया है।
- प्रेरणादायी शैली: यह पुस्तक पाठक के भीतर सत्य को खोजने और उस पर अडिग रहने का साहस पैदा करती है।
4. निष्कर्ष
डॉ. भारिल्ल इस पुस्तक के माध्यम से यह सिद्ध करते हैं कि कानजीस्वामी ने किसी नए मत की स्थापना नहीं की, बल्कि लुप्त हो रहे आचार्य कुन्दकुन्द के 'शुद्ध अध्यात्म' को पुनर्जीवित कर इस युग में उसे घर-घर तक पहुँचाया।
5. संदर्भ और उपलब्धता
- भाषा: सुबोध, प्रवाहमयी और प्रभावशाली हिंदी।
- उपयोगिता: इतिहास के जिज्ञासुओं और आध्यात्मिक साधकों के लिए अनिवार्य ग्रंथ।
- डिजिटल लिंक: यह Atma Dharma और Jain eBooks पर उपलब्ध है।
6. संबंधित साहित्य
- आत्मधर्म (पत्रिका): स्वामी जी के सिद्धांतों के प्रचार का प्रमुख माध्यम।
- सोनगढ़ का संदेश: स्वामी जी के प्रवचनों का संकलन।