योगसार पद्यानुवाद (Yogasara Padyanuvad)
मूल रचना: आचार्य जोइन्दु (योगिन्दुदेव) - अपभ्रंश गाथाएँ
पद्यानुवाद: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर
1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय
'योगसार' अपभ्रंश भाषा का एक अत्यंत लोकप्रिय और मर्मस्पर्शी आध्यात्मिक ग्रंथ है। इसमें आचार्य जोइन्दु ने आत्मा के शुद्ध स्वरूप का बहुत ही सरल लेकिन प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया है। डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी ने इसकी गहरी वैराग्यपरक गाथाओं का सरल हिंदी छंदों में पद्यानुवाद किया है, जिससे इसका आध्यात्मिक मर्म सीधे हृदय तक पहुँचता है।
2. मुख्य विषय और विशेषताएँ (Key Highlights)
- शुद्धातम का शंखनाद: इस ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य जीव को शरीर और राग-द्वेष से भिन्न उसकी "शुद्ध आत्मा" का अनुभव कराना है।
- सरलता और गहराई: आचार्य जोइन्दु ने बहुत ही सीधे और सरल उदाहरणों से समझाया है कि "देव मंदिर में नहीं, अपनी देह रूपी देवालय में ही विराजमान हैं।"
- व्यवहार का निषेध: यह ग्रंथ बाहरी क्रियाकांडों, तीर्थ-यात्राओं और मंत्र-जाप की तुलना में 'आत्म-ध्यान' को सर्वोपरि मानता है।
- भेद-विज्ञान की प्रधानता: डॉ. भारिल्ल के पद्यानुवाद में यह स्पष्ट झलकता है कि कैसे एक संसारी जीव अपने अज्ञान को छोड़कर 'परमात्मा' बन सकता है।
3. पद्यानुवाद की एक बानगी (Sample Verse)
आत्मा की देह में उपस्थिति को डॉ. साहब ने इस प्रकार अनुदित किया है:
"देवल में जो देव है, वह तो है पाषाण।"
"देह देवल में जो देव है, उसे तू देव जान ॥"
4. उपयोगिता
- आत्म-चिंतन: यह ग्रंथ उन लोगों के लिए श्रेष्ठ है जो मौन रहकर आत्म-मंथन करना चाहते हैं।
- वैराग्य पोषण: इसकी एक-एक पंक्ति संसार से मोह हटाने और अपनी आत्मा में प्रीति जगाने वाली है।
- गागर में सागर: योगसार संक्षिप्त है, लेकिन इसमें 'समयसार' जैसा ही गहरा अध्यात्म समाहित है।
5. संदर्भ और उपलब्धता
6. संबंधित साहित्य
- परमात्म प्रकाश: आचार्य जोइन्दु की एक और महान आध्यात्मिक कृति।
- समयसार कलश पद्यानुवाद: शुद्ध आत्मा के वैभव का काव्यमय वर्णन।