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योगसार प्राभृत (Yogasara Prabhrita) दिगंबर जैन परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और योग-प्रधान ग्रंथ है। इसकी रचना आचार्य अमितगति (10वीं-11वीं शताब्दी) द्वारा संस्कृत भाषा में की गई है। Exotic India Art Exotic India Art +1 यह ग्रंथ मुख्य रूप से आत्मा की शुद्धि, ध्यान और समाधि की प्रक्रियाओं पर केंद्रित है। ग्रंथ की मुख्य विशेषताएं: रचनाकार: आचार्य अमितगति (द्वितीय), जो राजा मुंज के समकालीन थे। कुल श्लोक: इसमें लगभग 540 श्लोक हैं। मुख्य विषय: यह ग्रंथ सात तत्वों (जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष) के माध्यम से मोक्षमार्ग और विशेष रूप से 'जैन योग' का वर्णन करता है। भेद-विज्ञान: इसमें आत्मा और शरीर के भेद को जानकर आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) करने की विधियों पर बल दिया गया है।
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