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"ये तो सोचा ही नहीं" (Ye To Socha Hi Nahin) पंडित रतनचन्द भारिल्ल जी द्वारा लिखित एक अत्यंत लोकप्रिय और विचारोत्तेजक लघु पुस्तक है। यह पुस्तक पाठकों को उन मूलभूत गलतियों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए मजबूर करती है, जिन्हें हम धर्म और जीवन के नाम पर अनजाने में करते आ रहे हैं। पुस्तक का मुख्य उद्देश्य: इस पुस्तक का शीर्षक एक 'चौंकाने वाला' वाक्यांश है। यह उस स्थिति को दर्शाता है जब एक व्यक्ति जीवन भर धर्म करने का दावा तो करता है, लेकिन जब उसे असलियत पता चलती है, तो उसके मुँह से निकलता है— "अरे! मैंने इस नजरिए से तो कभी सोचा ही नहीं!" मुख्य विचार और संदेश: क्रिया बनाम भाव: भारिल्ल जी बताते हैं कि हम शरीर की क्रियाओं (जैसे व्रत, उपवास, पूजन) को ही धर्म मान लेते हैं, जबकि असली धर्म आत्मा के परिणामों (भावों) में होता है। लोक-मूढ़ता और परंपरा: हम अक्सर बिना सोचे-समझे केवल इसलिए कुछ करते हैं क्योंकि "सब ऐसा ही कर रहे हैं" या "परंपरा ऐसी ही है"। यह पुस्तक हमें हर क्रिया के पीछे का 'तर्क' और 'प्रयोजन' सोचने पर मजबूर करती है। सुख की गलत दिशा: हम सुख बाहर की चीजों (धन, परिवार, अनुकूल परिस्थिति) में खोजते हैं, जबकि सुख का स्वभाव आत्मा के भीतर है। लेखक तर्क देते हैं कि "जो चीज मेरे पास है ही नहीं, वह मुझे सुख कैसे दे सकती है?" वस्तु स्वातंत्र्य: इसमें समझाया गया है कि हम दूसरे का काम करने का अहंकार पाल लेते हैं (जैसे "मैं बच्चों को पाल रहा हूँ"), जबकि हर द्रव्य स्वतंत्र है। यह सत्य जानकर जो मानसिक शांति मिलती है, वह अद्भुत है।
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