वीतरागी व्यक्तित्व : भगवान महावीर (Vitaragi Vyaktitva: Bhagwan Mahaveera)
लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर
1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय
'वीतरागी व्यक्तित्व' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी की एक उत्कृष्ट कृति है जो भगवान महावीर को एक 'महापुरुष' या 'शासक' के रूप में नहीं, बल्कि एक 'वीतरागी संत' और 'परमात्मा' के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक महावीर के बाह्य जीवन से अधिक उनके आंतरिक परिणामों (भावों) और उनकी वीतरागता के रहस्यों को खोलने का प्रयास करती है।
2. मुख्य विषय और वैचारिक बिंदु (Key Highlights)
- वीतरागता का अर्थ: लेखक स्पष्ट करते हैं कि वीतरागता का अर्थ केवल उदासीनता नहीं, बल्कि मोह, राग और द्वेष का सर्वथा अभाव है। महावीर का पूरा व्यक्तित्व इसी वीतरागता का दर्पण है।
- शौर्य और शांति का संगम: वर्धमान से महावीर बनने की यात्रा में उनका 'वीर' भाव युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि अपनी कषायों और इंद्रियों को जीतने में प्रकट हुआ।
- उपसर्गों में समता: संगम देव और अन्य द्वारा दिए गए घोर कष्टों के समय भी उनके मन में शत्रु के प्रति रंचमात्र भी द्वेष क्यों नहीं आया? इस मानसिक स्थिति का तार्किक विश्लेषण इस पुस्तक में मिलता है।
- दिव्यध्वनि और वीतरागी उपदेश: समवशरण में महावीर का उपदेश किसी को 'परिवर्तित' करने के लिए नहीं, बल्कि वस्तु के स्वभाव को बताने के लिए खिरता है। इसमें उनके 'अकर्ता' स्वभाव की महिमा बताई गई है।
- अनेकांत का व्यक्तित्व: महावीर का व्यक्तित्व स्वयं में 'अनेकांत' का जीता-जागता उदाहरण था, जहाँ वे एक ओर वज्र के समान कठोर (अपने संकल्प में) और दूसरी ओर कमल के समान कोमल (जीव मात्र के प्रति) थे।
3. पुस्तक का आध्यात्मिक संदेश
डॉ. भारिल्ल इस पुस्तक के माध्यम से यह समझाते हैं कि:
"महावीर की पूजा का सच्चा फल उनके जैसा 'वीतरागी' बनना है। जब तक हमारे भीतर किसी के प्रति राग या द्वेष है, तब तक हमने महावीर के व्यक्तित्व को सही मायनों में नहीं पहचाना।"
4. लेखन शैली
- गहन विश्लेषण: यह पुस्तक केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करती, बल्कि घटनाओं के पीछे छिपे 'अध्यात्म' को स्पष्ट करती है।
- तार्किक भाषा: डॉ. साहब की विशिष्ट शैली में हर बात को न्याय और तर्क की कसौटी पर कसा गया है।
5. संदर्भ और उपलब्धता
- भाषा: गंभीर, प्रभावशाली और संस्कृतनिष्ठ सरल हिंदी।
- उपयोगिता: ध्यान, चिंतन और गहरे स्वाध्याय के लिए सर्वश्रेष्ठ।
- डिजिटल लिंक: Jain eBooks और Atma Dharma पर उपलब्ध।
6. संबंधित साहित्य
- तीर्थंकर भगवान महावीर: जीवन चरित्र के विस्तार हेतु।
- अनेकांत और स्याद्वाद: वैचारिक दर्शन को समझने हेतु।