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विषय: सिद्ध परमेष्ठी का स्वरूप एवं उनकी जयमाला का आध्यात्मिक मर्म
व्याख्या: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
जैन दर्शन के अनुसार, जिन्होंने आठों कर्मों का नाश कर दिया है और जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर सिद्धशिला (लोक के अग्र भाग) पर विराजमान हैं, वे 'सिद्ध' हैं। जयमाला का मुख्य उद्देश्य इन मुक्त आत्माओं के गुणों का गान करके स्वयं के भीतर छिपे सिद्धत्व को पहचानना है।
सिद्ध जयमाला में सबसे पहले आठ कर्मों के नाश से प्रकट हुए आठ गुणों की वंदना की जाती है:
डॉ. भारिल्ल अपनी व्याख्याओं में समझाते हैं कि सिद्ध 'अशरीरी' (बिना शरीर के) हैं। जयमाला का मर्म यह है कि आत्मा देह नहीं है। सिद्धों का निराकार रूप यह सिद्ध करता है कि चैतन्य का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है जिसे किसी बाहरी आधार की आवश्यकता नहीं है।
जयमाला में सिद्धों को "अव्याबाध सुख" का स्वामी कहा गया है। इसका अर्थ है ऐसा सुख जिसमें कोई बाधा (Disturbance) न हो। यह सुख इन्द्रियों से नहीं, बल्कि आत्मा के स्वभाव से पैदा होता है।
डॉ. भारिल्ल की विशेषता यह है कि वे जयमाला को केवल 'स्तुति' नहीं रहने देते। वे जयमाला के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि:
"जो गुण सिद्धों में प्रकट हुए हैं, वे ही शक्ति रूप में मेरे भीतर मौजूद हैं। सिद्धों को देखना वास्तव में अपने भविष्य को देखने जैसा है।"
डॉ. भारिल्ल के अनुसार, सिद्धभक्ति का फल केवल पुण्य बांधना नहीं है, बल्कि 'भेद-विज्ञान' प्राप्त करना है। जयमाला पढ़ते समय यदि जीव को यह प्रतीति हो जाए कि "मैं भी स्वभाव से सिद्ध ही हूँ," तो वह सच्ची अर्चना है।
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