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Cover of सिद्धभक्ति (जयमाला का अर्थ)
Bhakti & Worship

सिद्धभक्ति (जयमाला का अर्थ)

Siddhabhakti (Jaymala Ka Arth)

by Dr. Hukamchand Bharill

10approx.

* Prices are subject to revision. Delivery fees may vary by location.

Publisher

Pandit Todarmal Smarak Trust

A-4, Bapu Nagar, Jaipur-302015, Rajasthan

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ptstjaipur@yahoo.com Website

Description

सिद्धभक्ति (जयमाला का अर्थ) - डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल के आलोक में

विषय: सिद्ध परमेष्ठी का स्वरूप एवं उनकी जयमाला का आध्यात्मिक मर्म
व्याख्या: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)


1. सिद्ध कौन हैं?

जैन दर्शन के अनुसार, जिन्होंने आठों कर्मों का नाश कर दिया है और जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर सिद्धशिला (लोक के अग्र भाग) पर विराजमान हैं, वे 'सिद्ध' हैं। जयमाला का मुख्य उद्देश्य इन मुक्त आत्माओं के गुणों का गान करके स्वयं के भीतर छिपे सिद्धत्व को पहचानना है।


2. जयमाला का मुख्य अर्थ और रहस्य (Key Highlights)

क. अष्ट कर्मों का अभाव

सिद्ध जयमाला में सबसे पहले आठ कर्मों के नाश से प्रकट हुए आठ गुणों की वंदना की जाती है:

  • ज्ञानावरण के नाश से: अनंत ज्ञान।
  • दर्शनावरण के नाश से: अनंत दर्शन।
  • मोहनीय के नाश से: क्षायिक सम्यक्त्व।
  • अंतराय के नाश से: अनंत वीर्य (शक्ति)।
  • (इसी प्रकार आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय कर्मों के नाश से उत्पन्न गुणों का वर्णन)।

ख. अशरीरी और निराकार स्वरूप

डॉ. भारिल्ल अपनी व्याख्याओं में समझाते हैं कि सिद्ध 'अशरीरी' (बिना शरीर के) हैं। जयमाला का मर्म यह है कि आत्मा देह नहीं है। सिद्धों का निराकार रूप यह सिद्ध करता है कि चैतन्य का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है जिसे किसी बाहरी आधार की आवश्यकता नहीं है।

ग. अव्याबाध सुख (Infinite Bliss)

जयमाला में सिद्धों को "अव्याबाध सुख" का स्वामी कहा गया है। इसका अर्थ है ऐसा सुख जिसमें कोई बाधा (Disturbance) न हो। यह सुख इन्द्रियों से नहीं, बल्कि आत्मा के स्वभाव से पैदा होता है।

घ. 'भक्त' से 'भगवान' बनने की प्रेरणा

डॉ. भारिल्ल की विशेषता यह है कि वे जयमाला को केवल 'स्तुति' नहीं रहने देते। वे जयमाला के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि:

"जो गुण सिद्धों में प्रकट हुए हैं, वे ही शक्ति रूप में मेरे भीतर मौजूद हैं। सिद्धों को देखना वास्तव में अपने भविष्य को देखने जैसा है।"


3. जयमाला की प्रसिद्ध पंक्तियों का मर्म

  • "नित शुद्ध बुद्ध चैतन्य मय...": सिद्धों का स्वरूप हमेशा शुद्ध और ज्ञानमयी है।
  • "लोक शिखर पर वास आपका...": यह स्थान की नहीं, बल्कि कर्मों के बोझ से मुक्ति के बाद आत्मा के ऊर्ध्व-गमन (ऊपर जाने) के स्वभाव की जय है।
  • "अब हम शरण तुम्हारी आए...": यहाँ 'शरण' का अर्थ है उनके जैसे गुणों को अपने भीतर खोजने का संकल्प।

4. आध्यात्मिक निष्कर्ष

डॉ. भारिल्ल के अनुसार, सिद्धभक्ति का फल केवल पुण्य बांधना नहीं है, बल्कि 'भेद-विज्ञान' प्राप्त करना है। जयमाला पढ़ते समय यदि जीव को यह प्रतीति हो जाए कि "मैं भी स्वभाव से सिद्ध ही हूँ," तो वह सच्ची अर्चना है।


5. संदर्भ और स्रोत

  • अर्चना (JB): डॉ. भारिल्ल द्वारा संकलित पूजन संग्रह।
  • सिद्धचक्र विधान: सिद्धों की महिमा का विस्तृत वर्णन करने वाला अनुष्ठान।
  • अध्यात्म के गीत: सिद्धों के स्वरूप पर आधारित पद्य।

Language
Hindi
ISBN
-
Formats
Paperback

Topics

Tattvagyan