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नाटक समयसार (Natak Samayasara) जैन अध्यात्म का एक अनुपम ग्रंथ है, जिसे कविवर बनारसीदास जी ने 17वीं शताब्दी (विक्रम संवत 1693) में ब्रजभाषा में रचा था। यह मूल रूप से आचार्य कुन्दकुन्ददेव के 'समयसार' और उस पर आचार्य अमृतचन्द्र की 'आत्मख्याति' टीका का एक पद्यमय (काव्यात्मक) भावानुवाद है। मुख्य विशेषताएं: अध्यात्म और साहित्य का संगम: यह केवल एक दार्शनिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि उत्कृष्ट हिंदी काव्य का नमूना भी है। इसमें शांत रस की प्रधानता है। नाटक क्यों? इसे 'नाटक' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें जीवात्मा और पुद्गल (जड़) के बीच होने वाले द्वंद्व और अंततः आत्मा के शुद्ध स्वरूप के प्रकट होने को एक 'नाटक' या रंगमंच की तरह प्रस्तुत किया गया है। अधिकार: इसमें मूल समयसार की तरह ही जीव-अजीव, कर्ता-कर्म, पुण्य-पाप, और निर्जरा जैसे विभिन्न 'अंक' या अधिकार हैं। भाषा: इसकी रचना सरल और प्रभावपूर्ण ब्रजभाषा में की गई है, जिससे यह सामान्य पाठकों के लिए भी सुलभ है।
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