Cover of समयसार महामंडल विधान (गाथा सहित)
Bhakti & Worship

समयसार महामंडल विधान (गाथा सहित)

Samaysar Mahamandal Vidhaan (Gatha Sahit)

by Dr. Hukamchand Bharill

30approx.

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Publisher

Pandit Todarmal Smarak Trust

A-4, Bapu Nagar, Jaipur-302015, Rajasthan

Description

समयसार महामंडल विधान (Samayasara Mahamandal Vidhan)

लेखक/रचयिता: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
मूल आधार: आचार्य कुन्दकुन्ददेव कृत 'समयसार'
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर


1. विधान का संक्षिप्त परिचय

'समयसार महामंडल विधान' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी की एक कालजयी रचना है। यह आचार्य कुन्दकुन्द के महान ग्रंथ 'समयसार' की ४१५ गाथाओं के आध्यात्मिक मर्म को भक्ति, अर्घ्य और जयमाला के रूप में प्रस्तुत करता है। यह विधान केवल क्रियाकांड नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से 'शुद्धनय' का अभ्यास और 'आत्म-अनुभूति' का महोत्सव है।


2. मुख्य संरचना और अधिकार (Structure Based on Samayasara)

यह विधान समयसार के मुख्य अधिकारों के अनुसार व्यवस्थित है:

  1. जीवाजीवाधिकार: आत्मा और शरीर के भेद-विज्ञान पर आधारित अर्घ्य।
  2. कर्ता-कर्म अधिकार: "मैं पर का कर्ता नहीं हूँ" – इस सत्य का शंखनाद करने वाले पद।
  3. पुण्य-पाप अधिकार: पुण्य और पाप दोनों को 'बेड़ी' मानकर उनसे पार होने का संदेश।
  4. आस्रव-संवर-निर्जरा-बंध: कर्मों के आने, रुकने और झड़ने की आध्यात्मिक प्रक्रिया का वर्णन।
  5. मोक्ष अधिकार: आत्मा की पूर्ण स्वाधीनता और सिद्ध पद की महिमा।
  6. सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार: आत्मा के अखंड, अभेद और शुद्ध चैतन्य स्वरूप का स्तवन।

3. विधान की आध्यात्मिक विशेषताएँ

  • निश्चय प्रधान भक्ति: इस विधान की हर पंक्ति जीव को व्यवहार से हटाकर अपनी शुद्ध आत्मा (समयसार) के आश्रय की प्रेरणा देती है।
  • तार्किक काव्य: डॉ. साहब ने आचार्य अमृतचन्द्र की 'आत्मख्याति' टीका के कलशों और गाथाओं के भाव को बहुत ही तार्किक और प्रभावशाली छंदों में पिरोया है।
  • अध्यात्म की गहराई: यह विधान पढ़ते समय ऐसा अनुभव होता है मानो साक्षात् कुन्दकुन्ददेव की दिव्यध्वनि गूँज रही हो। इसकी जयमालाएँ अध्यात्म का निचोड़ हैं।

4. विधान का आध्यात्मिक मर्म

डॉ. भारिल्ल इस विधान के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि:

"असली विधान वह है जिसमें 'स्व' और 'पर' का विभाग हो जाए और जीव अपने 'ज्ञायक स्वभाव' में स्थिर हो जाए। समयसार को पूजने का अर्थ स्वयं के भीतर के 'भगवान' को पूजना है।"


5. संदर्भ और उपलब्धता

  • भाषा: शुद्ध हिंदी (ब्रज और खड़ी बोली) एवं मूल प्राकृत गाथाओं के अंश।
  • उपयोगिता: पंचकल्याणक प्रतिष्ठा, बड़े आध्यात्मिक शिविरों और सामूहिक अनुष्ठानों के लिए।
  • डिजिटल लिंक: यह Atma Dharma और Jain eBooks पर उपलब्ध है।

6. संबंधित साहित्य

  • समयसार अनुशीलन: इस विधान के दार्शनिक आधार को विस्तार से समझने हेतु।
  • गाथा समयसार: मूल गाथाओं के पाठ के लिए।
  • समयसार कलश पद्यानुवाद: अमृतचन्द्र आचार्य कृत कलशों का काव्य अनुवाद।
Language
Hindi
ISBN
-
Formats
Paperback

Topics

Vidhaan