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सामान्य श्रावकाचार (Samanya Shravakachar) पंडित रतनचंद भारिल्ल जी द्वारा रचित एक व्यावहारिक और मार्गदर्शक पुस्तक है। यह पुस्तक उन श्रावकों (गृहस्थों) के लिए लिखी गई है जो अपनी व्यस्त जीवनशैली के बीच भी आध्यात्मिक मार्ग पर चलना चाहते हैं। जहाँ पारंपरिक श्रावकाचार ग्रंथ (जैसे रत्नकरण्ड श्रावकाचार) व्रतों और क्रियाओं के सूक्ष्म विवरणों पर केंद्रित होते हैं, भारिल्ल जी का यह ग्रंथ भावों की शुद्धि और दैनिक जीवन में अध्यात्म के अनुप्रयोग पर अधिक बल देता है। पुस्तक के मुख्य आकर्षण: श्रावक की परिभाषा: भारिल्ल जी के अनुसार, श्रावक केवल वह नहीं है जिसने कुछ त्याग किया है, बल्कि वह है जिसकी श्रद्धा सम्यक है और जो अपनी आत्मा की शुद्धता के प्रति जागरूक है। 'श्र' (श्रद्धा), 'व' (विवेक), और 'क' (क्रिया) का सुंदर समन्वय ही श्रावकत्व है। दैनिक चर्या: इसमें एक आदर्श जैन श्रावक की दिनचर्या का वर्णन है—जैसे देव-दर्शन, पूजन, स्वाध्याय और सामायिक। लेकिन पंडित जी यहाँ भी 'यांत्रिकता' (Mechanical rituals) के बजाय 'प्रयोजन' (Purpose) पर जोर देते हैं। अष्ट मूलगुण: इस पुस्तक में मांस, मदिरा, मधु के त्याग और पाँच अणुव्रतों (अहिंसा, सत्य आदि) के पालन को केवल "नियम" के रूप में नहीं, बल्कि "आत्म-रक्षा" के रूप में समझाया गया है। निश्चय और व्यवहार का मेल: यह पुस्तक सिखाती है कि बाहर से क्रियाएँ (व्रत-नियम) पालते हुए भी भीतर से यह स्पष्ट रहना चाहिए कि "मैं शुद्ध चेतन आत्मा हूँ और ये व्रत केवल कषायों को मंद करने के साधन हैं।" वस्तु स्वातंत्र्य और श्रावक: गृहस्थ जीवन में अनेक जिम्मेदारियाँ होती हैं। भारिल्ल जी समझाते हैं कि कैसे एक श्रावक 'कर्तापन' का अहंकार छोड़कर अपने कर्तव्यों को कुशलतापूर्वक निभाते हुए भी 'अकर्ता' रह सकता है।
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