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समाधितन्त्र (Samadhi Tantra) जैन दर्शन का एक अत्यंत प्रभावशाली और छोटा आध्यात्मिक ग्रंथ है। इसके रचयिता भी आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी) हैं, जिन्होंने 'इष्टोपदेश' की रचना की थी। यह ग्रंथ मुख्य रूप से आध्यात्मिक ध्यान और आत्म-साक्षात्कार पर केंद्रित है। इसमें कुल 105 श्लोक हैं। मुख्य विषय और शिक्षाएँ तीन प्रकार की आत्माएं: आचार्य पूज्यपाद ने इस ग्रंथ में आत्मा की तीन अवस्थाओं का सुंदर वर्णन किया है: बहिरात्मा (External Soul): वह जो शरीर और आत्मा को एक ही समझता है। यह अज्ञानता की अवस्था है। अंतरात्मा (Internal Soul): वह जो विवेक-ज्ञान से शरीर और आत्मा के भेद को जान लेता है। यह मोक्षमार्ग की शुरुआत है। परमात्मा (Supreme Soul): वह जो कर्मों का नाश कर पूर्ण शुद्ध और बुद्ध हो गया है (सिद्ध/अरहंत)। भेद-विज्ञान: ग्रंथ का मुख्य जोर इस बात पर है कि साधक कैसे 'स्व' (आत्मा) और 'पर' (शरीर, राग-द्वेष) के बीच अंतर करना सीखे। समाधि का अर्थ: यहाँ 'समाधि' का अर्थ केवल आँखें बंद करके बैठना नहीं है, बल्कि अपनी शुद्ध चेतना में लीन होना और बाहरी दुनिया से मोह हटाना है। कर्मों से मुक्ति: इसमें बताया गया है कि कैसे विचार और ध्यान की एकाग्रता से पुराने कर्मों की निर्जरा की जा सकती है। ग्रंथ की विशेषता सरलता: यह ग्रंथ बहुत ही सरल संस्कृत में लिखा गया है, जिससे यह ध्यान के अभ्यासुओं के लिए एक मार्गदर्शिका (Manual) की तरह काम करता है। अध्यात्म का सार: इसे 'आध्यात्मिक उपनिषद' की तरह माना जाता है क्योंकि यह बाहरी क्रियाकांडों के बजाय आंतरिक परिवर्तन पर जोर देता है।
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