समाधिमरण या सल्लेखना (Samadhimaran ya Sallekhana)
लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर
1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय
'समाधिमरण या सल्लेखना' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी द्वारा लिखित एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है जो मृत्यु के प्रति भय को दूर कर उसे एक 'महोत्सव' के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करती है। यह पुस्तक जैन दर्शन के 'सल्लेखना' सिद्धांत को तार्किक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार पर स्पष्ट करती है।
2. मुख्य विषय और विवेचन (Key Highlights)
- सल्लेखना आत्महत्या नहीं है: डॉ. साहब ने प्रबल तर्कों से यह सिद्ध किया है कि सल्लेखना और आत्महत्या में जमीन-आसमान का अंतर है। आत्महत्या कषाय (क्रोध, मोह, हताशा) के वशीभूत होकर की जाती है, जबकि सल्लेखना कषायों के त्याग और आत्म-शांति के साथ की जाने वाली साधना है।
- बाहरी और आंतरिक सल्लेखना:
- बाहरी: भोजन और शरीर के ममत्व का क्रमशः त्याग।
- आंतरिक: राग, द्वेष और कषायों का त्याग कर शुद्ध आत्मा में लीन होना।
- तैयारी का मार्ग: समाधिमरण कोई अंत समय की आकस्मिक क्रिया नहीं है। जो जीवन भर 'भेद-विज्ञान' (आत्मा और शरीर को अलग जानने) का अभ्यास करता है, वही अंत समय में समाधिपूर्वक शरीर छोड़ सकता है।
- वस्तु स्वातंत्र्य और मृत्यु: मृत्यु केवल एक अवस्था (पर्याय) का बदलना है, द्रव्य (आत्मा) का नाश नहीं। इस सिद्धांत को समझकर मृत्यु का भय स्वतः समाप्त हो जाता है।
- परिवार जनों का कर्तव्य: अंत समय में परिजनों को कैसा वातावरण बनाना चाहिए और मुमुक्षु को कैसे संबोधन (उद्बोधन) देना चाहिए, इसका व्यावहारिक मार्गदर्शन भी इसमें दिया गया है।
3. पुस्तक का आध्यात्मिक सार
डॉ. भारिल्ल इस पुस्तक में लिखते हैं:
"मरण तो सबका होना ही है, पर 'समाधिमरण' केवल उसका होता है जिसने जीवन को 'साधना' बनाया हो।"
4. संदर्भ और उपलब्धता
- भाषा: तार्किक, गंभीर और मर्मस्पर्शी हिंदी।
- उपयोगिता: मुमुक्षुओं, वृद्धों और दर्शन के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य साहित्य।
- डिजिटल लिंक: यह Jain eBooks और Atma Dharma पर उपलब्ध है।
5. संबंधित साहित्य
- विदाई की बेला: इसी विषय पर आधारित पंडित रतनचंद भारिल्ल जी की कृति।
- समाधि तंत्र: आचार्य पूज्यपाद कृत मूल ग्रंथ।