
Samadhi, Sadhna Aur Sallekhna
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समाधि, साधना और सल्लेखना (Samadhi, Sadhana aur Sallekhana) पंडित रतनचंद भारिल्ल जी द्वारा रचित एक अत्यंत गंभीर और महत्वपूर्ण पुस्तक है। यह कृति जैन धर्म के सबसे संवेदनशील और गहराई वाले विषय 'सल्लेखना' (शांतिपूर्ण मरण) को तार्किक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से स्पष्ट करती है। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य सल्लेखना के प्रति समाज में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करना और इसके वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप को सामने लाना है। पुस्तक के मुख्य बिंदु: साधना (Sadhana): लेखक स्पष्ट करते हैं कि सल्लेखना कोई अचानक की जाने वाली क्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवन भर की गई "साधना" का अंतिम फल है। यदि जीवन भर आत्मा की साधना की है, तभी अंत समय में समाधि संभव है। सल्लेखना का स्वरूप (Nature of Sallekhana): भारिल्ल जी ने तर्कों के साथ यह सिद्ध किया है कि सल्लेखना आत्महत्या नहीं है। आत्महत्या कषाय (क्रोध, मोह, दुख) के वशीभूत होकर की जाती है, जबकि सल्लेखना कषायों के अभाव और शांत परिणामों के साथ "स्वैच्छिक और विवेकपूर्ण" त्याग है। समाधि मरण (Samadhi Maran): पुस्तक में 'समाधि' का अर्थ मृत्यु के समय आत्म-लीनता बताया गया है। शरीर के छूटने पर दुख न करना और अपने शुद्ध ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव में रहना ही सच्ची समाधि है। व्यावहारिक मार्गदर्शिका: इसमें सल्लेखना की विधि, उसके पूर्व की तैयारी और उस समय की मानसिक स्थिति कैसी होनी चाहिए, इसका विस्तृत वर्णन है।
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