रीति-नीति (Reeti-Neeti)
लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर
1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय
'रीति-नीति' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी की एक अत्यंत व्यावहारिक और जीवनोपयोगी कृति है। इस पुस्तक में अध्यात्म को केवल सैद्धांतिक स्तर पर नहीं, बल्कि दैनिक व्यवहार (Practical Conduct) के धरातल पर समझाया गया है। यह "Art of Living" का जैन परिप्रेक्ष्य है।
2. मुख्य विषय और विवेचन (Key Highlights)
- नीतिपूर्ण जीवन: डॉ. साहब ने तर्क दिया है कि जिसके जीवन में 'नीति' (Honesty/Ethics) नहीं है, उसके जीवन में 'धर्म' का प्रवेश असंभव है।
- व्यावहारिकता और अध्यात्म: अक्सर लोग धर्म और लोक-व्यवहार को अलग मानते हैं, लेकिन यह पुस्तक सिखाती है कि आत्म-कल्याण के इच्छुक जीव का व्यवहार लोक में भी आदर्श और प्रामाणिक होना चाहिए।
- सदाचार (Morality): भोजन, व्यापार, और सामाजिक संबंधों में विवेक और सदाचार का पालन कैसे करें।
- कषायों का शमन: क्रोध, मान, माया, लोभ जैसे विकारों को व्यवहार के स्तर पर कैसे नियंत्रित किया जाए ताकि जीवन में शांति बनी रहे।
- युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन: यह पुस्तक आधुनिक जीवनशैली में जैन संस्कारों को बनाए रखने के लिए तार्किक समाधान प्रस्तुत करती है।
3. दार्शनिक दृष्टिकोण
डॉ. भारिल्ल की विशेषता यह है कि वे निश्चय (Absolute) को ध्यान में रखते हुए व्यवहार (Relative) की मर्यादा तय करते हैं। 'रीति-नीति' में वे समझाते हैं कि बाहरी आचरण (रीति) तब तक सफल नहीं है जब तक वह सही उद्देश्य (नीति/अभिप्राय) से न जुड़ा हो।
4. संदर्भ और उपलब्धता
- भाषा: स्पष्ट, तार्किक और प्रभावशाली हिंदी।
- पाठक: यह पुस्तक विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो धर्म को अपने काम और व्यवहार में उतारना चाहते हैं।
- डिजिटल लिंक: PTST Jaipur या Jain eBooks.
5. डॉ. भारिल्ल की अन्य प्रमुख कृतियाँ
- क्रमबद्ध पर्याय (Kramabaddha Paryaya)
- पंचास्तिकाय अनुशीलन (Panchastikaya Anushilan)
- समयसार अनुशीलन (Samayasara Anushilan)