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Cover of प्रवचनसार (जयसेनाचार्य)
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प्रवचनसार (जयसेनाचार्य)

Pravachansar (Jaysenacharya)

by Acharya Jaysena

70approx.

* Prices are subject to revision. Delivery fees may vary by location.

Publisher

Pandit Todarmal Smarak Trust

A-4, Bapu Nagar, Jaipur-302015, Rajasthan

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ptstjaipur@yahoo.com Website

Description

प्रवचनसार (आचार्य जयसेन की 'तात्पर्यवृत्ति' टीका सहित)

प्रवचनसार आचार्य कुंदकुंद देव की एक सर्वोत्कृष्ट दार्शनिक कृति है। जब हम जयसेनाचार्य के संदर्भ में इसकी बात करते हैं, तो हमारा तात्पर्य उनकी प्रसिद्ध संस्कृत टीका 'तात्पर्यवृत्ति' से होता है, जो ग्रंथ के गंभीर आध्यात्मिक रहस्यों को खोलने में मील का पत्थर मानी जाती है।


📖 ग्रंथ परिचय

  • मूल रचयिता: आचार्य कुंदकुंद (प्राकृत गाथाएँ)।
  • टीकाकार: आचार्य जयसेन (12वीं शताब्दी)।
  • टीका का नाम: तात्पर्यवृत्ति।
  • विषय: शुद्धोपयोग, ज्ञान-तत्त्व और ज्ञेय-तत्त्व का सूक्ष्म विश्लेषण।

🗝️ जयसेनाचार्य की टीका की विशेषताएँ

आचार्य जयसेन ने 'तात्पर्यवृत्ति' टीका के माध्यम से कुंदकुंद देव के मर्म को अत्यंत स्पष्ट किया है। उनकी शैली की कुछ विशिष्टताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. समन्वयवादी दृष्टिकोण: जयसेनाचार्य ने निश्चय नय (आध्यात्मिक पक्ष) और व्यवहार नय (आचरण पक्ष) के बीच सुंदर संतुलन बिठाया है।
  2. सुबोध संस्कृत: उनकी भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है, जिससे प्राकृत की दुरूह गाथाओं का अर्थ सामान्य विद्वानों के लिए भी सुलभ हो जाता है।
  3. शुद्धोपयोग पर बल: प्रवचनसार का मुख्य केंद्र 'शुद्धोपयोग' है। जयसेनाचार्य ने इसे प्राप्त करने की विधि और उसके फल (अतीन्द्रिय आनंद) की बहुत सूक्ष्म व्याख्या की है।
  4. दार्शनिक गहराई: उन्होंने अन्य दार्शनिक मतों के संदर्भ में जैन न्याय और स्याद्वाद को पुष्ट करते हुए गाथाओं का विस्तार किया है।

🏛️ ग्रंथ का विभाजन (मुख्य अधिकार)

प्रवचनसार मुख्यतः तीन प्रभागों (अधिकारों) में विभाजित है, जिन पर जयसेनाचार्य की टीका उपलब्ध है:

अधिकारविषय वस्तु
1. ज्ञानतत्त्व प्रज्ञापनइसमें ज्ञान और सुख की एकता बताई गई है। केवली भगवान के प्रत्यक्ष ज्ञान और अतीन्द्रिय सुख का स्वरूप वर्णित है।
2. ज्ञेयतत्त्व प्रज्ञापनइसमें द्रव्य, गुण और पर्याय का विश्लेषण है। जगत के पदार्थों (पुद्गल, जीव आदि) के स्वभाव को समझाया गया है।
3. चरणानुयोग सूचक चूलिकाइसमें मुनि धर्म, लिंग (भेष), और आचरण का वर्णन है। मोक्ष मार्ग में चारित्र की अनिवार्यता बताई गई है।

✨ मुख्य सिद्धांत: ज्ञान और सुख की एकता

आचार्य कुंदकुंद ने प्रवचनसार में कहा है कि जो 'शुद्धोपयोग' में लीन है, वही वास्तव में सुखी है। जयसेनाचार्य अपनी टीका में स्पष्ट करते हैं कि:

"जहाँ पूर्ण ज्ञान है, वहीं पूर्ण सुख है। इन्द्रिय जन्य सुख वास्तव में सुख नहीं, बल्कि दुख का ही एक रूप है।"


🖋️ संपादन और प्रकाशन टिपणियाँ

आधुनिक समय में, जयसेनाचार्य की टीका सहित प्रवचनसार के कई संस्करण उपलब्ध हैं। शोधार्थियों के लिए यह टीका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कई स्थानों पर पाठ-भेद और गाथाओं के क्रम का तार्किक स्पष्टीकरण दिया गया है।


### डेटा टैगिंग (Metadata)
- **शीर्षक:** प्रवचनसार (तात्पर्यवृत्ति टीका)
- **टीकाकार:** आचार्य जयसेन
- **मूल लेखक:** आचार्य कुंदकुंद
- **प्रमुख विषय:** शुद्धोपयोग, द्रव्य-गुण-पर्याय, श्रमण धर्म
- **अनुयोग:** द्रव्यानुयोग
Language
Hindi
ISBN
-
Formats
Upcoming

Topics

AnekantavadaEpistemology