JinWaniजिनवाणी
HomeBrowsePublishersPDF SitesAbout
Join as Publisher
Menu
HomeBrowse BooksView PublishersPDF SitesAboutPublisher Login
Join as Publisher

JinWani

A non-profit digital initiative to make physical Jain literature accessible by bridging the gap between readers and publishers.

HomePublishers DirectoryPublisher LoginJoin as PublisherPDF Sites ListAbout UsContact

Legal

Terms of ServicePrivacy PolicyUser Manual

Connect

FacebookFacebookYouTubeYouTubeTelegramTelegramXXInstagramInstagram JinSwara

Disclaimer: Information on this website is shared by respective publishers. While we strive to keep details accurate and up to date, Jinwani by JinSwara cannot guarantee the completeness or accuracy of publisher-provided information.

© 2026 JinWani. All rights reserved.

Back to Search
Cover of पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव
Dravyanuyog

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव

Panchkalyanak Pratishtha Mahotsav

by Dr. Hukamchand Bharill

15approx.

* Prices are subject to revision. Delivery fees may vary by location.

Publisher

Pandit Todarmal Smarak Trust

A-4, Bapu Nagar, Jaipur-302015, Rajasthan

Request on WhatsAppDirect Call
ptstjaipur@yahoo.com Website

Description

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव (Panchkalyanak Pratishtha Mahotsav)

लेखक/मार्गदर्शक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर


1. महोत्सव का संक्षिप्त परिचय

जैन दर्शन में 'पंचकल्याणक' वह महोत्सव है जो किसी तीर्थंकर के जीवन की पाँच मुख्य पवित्र अवस्थाओं को समर्पित होता है। जब किसी नई जिन-प्रतिमा की स्थापना होती है, तो उसे 'पाषाण' से 'परमात्मा' बनाने की आध्यात्मिक प्रक्रिया को ही 'पंचकल्याणक प्रतिष्ठा' कहा जाता है। डॉ. भारिल्ल ने इसे एक "आध्यात्मिक प्रयोगशाला" के रूप में परिभाषित किया है।


2. पाँच कल्याणक और उनका मर्म (The Five Auspicious Events)

  1. गर्भ कल्याणक: तीर्थंकर की आत्मा का माता के गर्भ में आगमन। यह जीव के पवित्रतम शुरुआत का प्रतीक है।
  2. जन्म कल्याणक: तीर्थंकर का जन्म और इन्द्रों द्वारा सुमेरु पर्वत पर क्षीर सागर के जल से किया गया अभिषेक।
  3. दीक्षा कल्याणक: लौकिक वैभव को छोड़कर मुनि धर्म अंगीकार करना। यह वैराग्य की पराकाष्ठा है।
  4. ज्ञान कल्याणक: कठोर तप के बाद 'केवलज्ञान' (पूर्ण ज्ञान) की प्राप्ति। यहाँ से वे 'अरिहंत' कहलाते हैं।
  5. मोक्ष कल्याणक: शरीर का त्याग कर सिद्ध अवस्था प्राप्त करना। यह पूर्ण स्वतंत्रता का प्रतीक है।

3. प्रतिष्ठा का वास्तविक रहस्य (The Secret of Pratishtha)

डॉ. भारिल्ल इस महोत्सव के पीछे के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करते हैं:

  • मंत्र शक्ति और भाव शक्ति: केवल मंत्रों के उच्चारण से प्रतिष्ठा नहीं होती, बल्कि प्रतिष्ठाचार्य और श्रावकों के विशुद्ध भावों से प्रतिमा में 'अरिहंत' पद का आरोपण होता है।
  • पाषाण से परमात्मा: प्रतिष्ठा का अर्थ पत्थर को भगवान बनाना नहीं है, बल्कि उस पत्थर के माध्यम से स्वयं की आत्मा में विराजमान 'भगवान' को देखने की कला सीखना है।
  • अतिशय और चमत्कार: डॉ. साहब स्पष्ट करते हैं कि सच्चा अतिशय प्रतिमा का बाहर से चमकना नहीं है, बल्कि उसे देखकर भक्त के परिणामों में जो शांति और वीतरागता आती है, वही असली चमत्कार है।

4. उत्सव का उद्देश्य

  • धर्म प्रभावना: समाज में धर्म के प्रति रुचि और संस्कार पैदा करना।
  • आत्म-कल्याण: महोत्सव में भाग लेने वाले प्रत्येक जीव को वैराग्य की प्रेरणा मिले और वह मोक्षमार्ग पर आगे बढ़े।
  • सामूहिक वात्सल्य: साधर्मियों के बीच प्रेम और एकता का विस्तार।

5. संदर्भ और उपयोगिता

  • भाषा: तार्किक, ओजस्वी और ज्ञानवर्धक।
  • उपयोगिता: प्रतिष्ठा महोत्सवों के आयोजकों, पात्रों (इन्द्र-इन्द्राणी) और सामान्य मुमुक्षुओं के लिए अनिवार्य मार्गदर्शन।
  • डिजिटल लिंक: इस विषय पर डॉ. साहब के प्रवचन और लेख Atma Dharma और PTST पर उपलब्ध हैं।

6. संबंधित साहित्य

  • जिनपूजन रहस्य: पूजन और अभिषेक की सूक्ष्मताओं के लिए।
  • तीर्थंकर भगवान महावीर: तीर्थंकर के जीवन को गहराई से समझने के लिए।
Language
Hindi
ISBN
-
Formats
Paperback

Topics

Prakaran