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Dravyanuyog

नियमसार कलश पद्यानुवाद

Niyamsar Kalash Padyanuvad

by Dr. Hukamchand Bharill

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Publisher

Pandit Todarmal Smarak Trust

A-4, Bapu Nagar, Jaipur-302015, Rajasthan

Description

नियमसार कलश पद्यानुवाद (Niyamasara Kalasha Padyanuvad)

मूल रचना (कलश): आचार्य अमृतचन्द्र / पद्मप्रभ मलधारिदेव (संस्कृत कलश)
पद्यानुवाद: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर


1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय

'नियमसार' आचार्य कुन्दकुन्ददेव की एक उत्कृष्ट कृति है जो 'निश्चय रत्नत्रय' (शुद्ध आत्म-अनुभूति) पर केंद्रित है। इस ग्रंथ की टीकाओं के बीच आने वाले संस्कृत कलश अध्यात्म के रस से भरे हुए हैं। डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी ने इन कलशों का अत्यंत मधुर और मार्मिक हिंदी पद्यानुवाद किया है, जिससे यह शुद्ध अध्यात्म पाठकों के हृदय तक सुगमता से पहुँच सके।


2. मुख्य विषय और आध्यात्मिक गहराई (Key Highlights)

  1. निश्चय चारित्र की प्रधानता: जहाँ अन्य ग्रंथों में व्यवहार की चर्चा होती है, नियमसार और उसके कलश पूर्णतः 'निश्चय' (शुद्ध आत्मा के आश्रय) की बात करते हैं।
  2. परम विशुद्ध भाव: इन पदों में आत्मा को राग-द्वेष, पुण्य-पाप और यहाँ तक कि 'भेद' (Division) से भी रहित एक अखंड ज्ञायक तत्व के रूप में वर्णित किया गया है।
  3. भक्ति और ज्ञान का संगम: पद्यानुवाद की शैली ऐसी है कि यह पढ़ते समय 'भक्ति' जैसा आनंद देती है और समझते समय 'भेद-विज्ञान' (Discrimination) का गहरा ज्ञान कराती है।
  4. शुद्धोपयोग का वर्णन: इसमें मुनिराजों और आत्म-ज्ञानी जीवों की उस अंतर्दशा का वर्णन है जब वे बाहरी दुनिया को भूलकर अपनी आत्मा में लीन होते हैं।

3. पद्यानुवाद की एक झलक (Sample Verse)

आत्मा की निर्विकल्प अवस्था को डॉ. साहब ने इन शब्दों में ढाला है:

"जहाँ न राग न द्वेष है, न मोह का सद्भाव।" "ज्ञायक भाव स्वरूप वह, मेरा शुद्ध स्वभाव ॥"


4. उपयोगिता

  • सामायिक के लिए: ध्यान और सामायिक के समय इन कलशों का पाठ एकाग्रता बढ़ाने में बहुत सहायक है।
  • गहन स्वाध्याय: नियमसार अनुशीलन के साथ इन पदों को पढ़ने से कुन्दकुन्ददेव का मर्म स्पष्ट हो जाता है।
  • वैराग्य पोषण: ये पद जीव को संसार की मोह-निद्रा से जगाने के लिए 'अलार्म' की तरह कार्य करते हैं।

5. संदर्भ और उपलब्धता

  • भाषा: संस्कृतनिष्ठ सरल और प्रवाहमयी हिंदी (काव्य)।
  • डिजिटल लिंक: यह Jain eBooks और Atma Dharma पर उपलब्ध है।

6. संबंधित साहित्य

  • समयसार कलश पद्यानुवाद: अमृतचन्द्र आचार्य के सुप्रसिद्ध कलश।
  • नियमसार अनुशीलन: डॉ. भारिल्ल द्वारा लिखित विस्तृत व्याख्या।
Language
Hindi
ISBN
-
Formats
Paperback

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