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Cover of निमित्तोपादान
Dravyanuyog

निमित्तोपादान

Nimittopadan

by Dr. Hukamchand Bharill

8approx.

* Prices are subject to revision. Delivery fees may vary by location.

Publisher

Pandit Todarmal Smarak Trust

A-4, Bapu Nagar, Jaipur-302015, Rajasthan

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ptstjaipur@yahoo.com Website

Description

निमित्तोपादान (Nimitta-Upadan)

लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर


1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय

'निमित्तोपादान' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी की एक अत्यंत तार्किक और क्रांतिकारी कृति है। यह पुस्तक जैन दर्शन के उस मूलभूत सिद्धांत को स्पष्ट करती है जिसके आधार पर यह समझा जा सकता है कि "विश्व में कार्य कैसे होता है?" यह पुस्तक पराधीनता की बेड़ियों को तोड़कर प्रत्येक द्रव्य की 'स्वाधीनता' सिद्ध करती है।


2. मुख्य अवधारणाएँ (Key Concepts)

इस पुस्तक में कार्य की उत्पत्ति के दो प्रमुख कारणों का सूक्ष्म विवेचन किया गया है:

क. उपादान कारण (Substantial Cause)

  • अर्थ: जो स्वयं कार्य रूप में परिणमित (बदलता) है।
  • उदाहरण: मिट्टी घड़े का उपादान कारण है क्योंकि मिट्टी ही घड़ा बनी है।
  • महत्व: यह 'शक्ति' है। कार्य की असली योग्यता द्रव्य के भीतर ही होती है।

ख. निमित्त कारण (Instrumental Cause)

  • अर्थ: जो कार्य की उत्पत्ति के समय सहायक के रूप में उपस्थित तो रहता है, पर कार्य रूप में बदलता नहीं।
  • उदाहरण: कुम्हार, चाक और दंड घड़े के निमित्त कारण हैं।
  • महत्व: यह केवल 'उपस्थिति' है। निमित्त कार्य करता नहीं, केवल कार्य होने पर 'निमित्त' कहलाता है।

3. पुस्तक के मुख्य वैचारिक बिंदु (Key Highlights)

  1. कार्य की स्वाधीनता: डॉ. साहब ने सिद्ध किया है कि कार्य अपनी 'उपादान' शक्ति से होता है, निमित्त उसे जबरदस्ती नहीं कर सकता। इससे जीव 'पर' (दूसरों) पर निर्भर रहने की मानसिकता से मुक्त होता है।
  2. भ्रांति निवारण: अक्सर लोग मानते हैं कि "भगवान ने मेरा कार्य किया" या "दवा ने मुझे ठीक किया।" यह पुस्तक समझाती है कि ये सब 'निमित्त' मात्र हैं, वास्तविक कार्य आपकी अपनी योग्यता (उपादान) से हुआ है।
  3. कर्तृत्व का अहंकार: यह सिद्धांत अहंकार को जड़ से मिटाता है। जब हम समझते हैं कि निमित्त कुछ करता ही नहीं, तो हम 'पर' के कर्ता बनने के बोझ से मुक्त हो जाते हैं।
  4. निश्चय और व्यवहार: निमित्त का कथन करना 'व्यवहार' है और उपादान की शक्ति को देखना 'निश्चय' है।

4. पुस्तक का आध्यात्मिक संदेश

डॉ. भारिल्ल इस पुस्तक के माध्यम से यह महान सत्य प्रकट करते हैं:

"कोई किसी का कुछ कर नहीं सकता। हर कार्य अपनी स्वयं की तत्समय की योग्यता (उपादान) से होता है। निमित्त तो केवल अनुकूलता का नाम है।"


5. संदर्भ और उपलब्धता

  • भाषा: अत्यंत तार्किक, वैज्ञानिक और प्रभावशाली हिंदी।
  • उपयोगिता: जैन दर्शन के गंभीर शोधार्थियों और अध्यात्म के जिज्ञासुओं के लिए 'अनिवार्य' ग्रंथ।
  • डिजिटल लिंक: यह Atma Dharma और Jain eBooks पर उपलब्ध है।

6. संबंधित साहित्य

  • क्रमबद्ध पर्याय: निमित्त-उपादान के सिद्धांत का भविष्योन्मुखी विस्तार।
  • षट्कारक: कार्य की छह आंतरिक शक्तियों के वर्णन हेतु।
  • नींव का पत्थर: वस्तु स्वातंत्र्य के प्रारंभिक परिचय के लिए।
Language
Hindi
ISBN
-
Formats
Paperback

Topics

Tattvagyan