Cover of क्रमबद्धपर्याय
Dravyanuyog

क्रमबद्धपर्याय

Krambaddhaparyaya

by Dr. Hukamchand Bharill

25approx.

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Publisher

Pandit Todarmal Smarak Trust

A-4, Bapu Nagar, Jaipur-302015, Rajasthan

Description

क्रमबद्ध पर्याय (Kramabaddha Paryaya)

लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर


1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय

'क्रमबद्ध पर्याय' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी की एक अत्यंत मौलिक, तर्कसंगत और क्रांतिकारी कृति है। यह पुस्तक जैन दर्शन के उस गहरे सिद्धांत को उजागर करती है जिसके अनुसार विश्व के प्रत्येक द्रव्य (आत्मा, पुद्गल आदि) की हर अवस्था (पर्याय) अपने निश्चित समय पर ही होती है। यह पुस्तक जीव को 'पर' का कर्ता बनने के व्यर्थ तनाव से मुक्त कर परम शांति का मार्ग दिखाती है।


2. मुख्य दार्शनिक आधार (Core Concepts)

  1. सर्वज्ञता (Kevalgyana): यदि भगवान महावीर या कोई भी केवली सर्वज्ञ हैं और वे भविष्य को जानते हैं, तो भविष्य निश्चित होना ही चाहिए। यदि भविष्य बदला जा सकता, तो सर्वज्ञता का सिद्धांत ही खंडित हो जाता।
  2. वस्तु स्वातंत्र्य: विश्व का प्रत्येक परमाणु स्वतंत्र है। कोई किसी का कुछ कर नहीं सकता। हर द्रव्य अपनी पर्याय का स्वयं कर्ता है।
  3. अकर्तृत्ववाद: इस पुस्तक का व्यावहारिक लक्ष्य जीव के 'कर्तृत्व के अहंकार' (Doership) को तोड़ना है। जब हम स्वीकार करते हैं कि "जो होना है वही हो रहा है", तब आत्मा सहज ही 'ज्ञाता-दृष्टा' भाव में स्थित हो जाती है।
  4. पुरुषार्थ का सही स्वरूप: डॉ. साहब ने स्पष्ट किया है कि क्रमबद्ध पर्याय का निर्णय करना 'कायरता' नहीं, बल्कि सबसे बड़ा 'पुरुषार्थ' है। सम्यक् पुरुषार्थ क्रमबद्ध के विरोध में नहीं, बल्कि उसके साथ ही होता है।

3. भ्रांतियों का निराकरण

डॉ. भारिल्ल ने तर्क के माध्यम से कई शंकाओं का समाधान किया है:

  • भाग्य बनाम पुरुषार्थ: वे समझाते हैं कि "होनी" में ही जीव का "प्रयत्न" भी शामिल है।
  • निश्चिंतता: यह सिद्धांत आलसी नहीं बनाता, बल्कि व्यर्थ की भाग-दौड़ और चिंताओं को समाप्त कर आत्म-कल्याण के लिए प्रेरित करता है।

4. पुस्तक का प्रभाव

इस कृति ने आधुनिक जैन जगत की विचार प्रक्रिया में एक महान परिवर्तन लाया। इसने 'निश्चय नय' और 'आध्यात्मिक स्वाधीनता' को घर-घर तक पहुँचाया। मुमुक्षु समाज में इसे "अध्यात्म का प्राण" माना जाता है।


5. संदर्भ और उपलब्धता

  • भाषा: अत्यंत तार्किक, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली हिंदी।
  • उपयोगिता: उन जिज्ञासुओं के लिए जो मानसिक तनाव, अहंकार और भविष्य की चिंता से मुक्त होना चाहते हैं।
  • डिजिटल लिंक: यह Atma Dharma और Jain eBooks पर उपलब्ध है।

6. संबंधित साहित्य

  • निमित्तोपादान: कार्य-कारण सिद्धांत को समझने के लिए।
  • समयसार अनुशीलन: इस सिद्धांत के आगमिक आधार के लिए।
  • ये तो सोचा ही नहीं: इसी विचारधारा का सरल परिचय।
Language
Hindi
ISBN
-
Formats
Paperback

Topics

Epistemology