गोली का जवाब गाली से भी नहीं (Goli Ka Jawab Gaali Se Bhi Nahin)
लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर
1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय
'गोली का जवाब गाली से भी नहीं' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी द्वारा लिखित एक क्रांतिकारी लघु पुस्तिका है। यह पुस्तक जैन धर्म के सर्वोच्च अहिंसा और उत्तम क्षमा के सिद्धांतों को आधुनिक सन्दर्भ में प्रस्तुत करती है। इसका शीर्षक एक गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है कि हिंसा का उत्तर प्रतिहिंसा या अपशब्दों से देना आत्म-कल्याण के मार्ग में बाधक है।
2. मुख्य विषय और वैचारिक बिंदु (Key Highlights)
- अहिंसा की पराकाष्ठा: डॉ. साहब तर्क देते हैं कि यदि कोई हम पर शारीरिक प्रहार (गोली) भी करे, तब भी हमें अपने वचनों और भावों में कटुता (गाली) नहीं लानी चाहिए। यह कायरता नहीं, बल्कि आत्मा की महानता और वीरता है।
- कषायों पर नियंत्रण: गाली देना हमारे स्वयं के क्रोध और अहंकार का प्रतीक है। दूसरों को अपशब्द कहकर हम अपना ही 'भाव-मरण' (Spiritual death) करते हैं।
- सामाजिक एकता और शांति: यह पुस्तक समाज में बढ़ते वैमनस्य और विवादों को सुलझाने के लिए 'मध्यस्थ भाव' (Equanimity) अपनाने की प्रेरणा देती है।
- प्रतिक्रिया बनाम क्रिया: हमें परिस्थितियों के अनुसार 'प्रतिक्रिया' (Reaction) देने के बजाय अपने 'स्वभाव' (Action based on self-nature) में स्थिर रहना चाहिए।
- क्षमस्व का भाव: भगवान महावीर के "क्षमा वीरस्य भूषणम्" (क्षमा वीरों का आभूषण है) सिद्धांत को इस पुस्तक में तार्किक ढंग से पुष्ट किया गया है।
3. पुस्तक का आध्यात्मिक सार
डॉ. भारिल्ल इस पुस्तक के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि:
"सामने वाला अपनी कषाय (क्रोध) के अधीन होकर गलत आचरण कर सकता है, लेकिन हमें अपनी कषायों के अधीन होकर अपना संस्कार और धर्म नहीं छोड़ना चाहिए।"
4. संदर्भ और उपलब्धता
- भाषा: ओजस्वी, तार्किक और सरल हिंदी।
- उपयोगिता: समाज सुधार, व्यक्तिगत क्रोध प्रबंधन (Anger Management) और युवाओं के लिए संस्कार निर्माण हेतु।
- डिजिटल लिंक: PTST Jaipur या Jain eBooks.
5. संबंधित साहित्य
- ये तो सोचा ही नहीं: वैचारिक क्रांति हेतु।
- रीति-नीति: आदर्श सामाजिक व्यवहार हेतु।
- क्षमा के द्वार: क्षमा धर्म के विस्तृत विवेचन हेतु।