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द्रव्य दृष्टि (Dravya Drishti), जिसे जैन दर्शन में 'शुद्धनय' या 'निश्चय दृष्टि' भी कहा जाता है, वह दृष्टिकोण है जो किसी वस्तु के ऊपरी, क्षणिक और बदलते हुए रूप (पर्याय) को गौण करके उसके त्रैकालिक, स्थायी और मूल स्वभाव (द्रव्य) को देखता है। पंडित रतनचंद भारिल्ल और अन्य विद्वानों ने इस विषय पर काफी जोर दिया है क्योंकि यह आत्म-साक्षात्कार का मूल आधार है। द्रव्य दृष्टि के मुख्य सिद्धांत: अविनाशी स्वभाव: यह दृष्टि शरीर, राग-द्वेष और संयोगों को 'पर' (दूसरा) मानती है और आत्मा को एक अखंड, अविनाशी और चैतन्य मात्र तत्व के रूप में देखती है। भेद-विज्ञान: द्रव्य दृष्टि ही वह साधन है जिससे 'स्व' और 'पर' का भेद स्पष्ट होता है। यह सिखाती है कि मैं "पर्याय" (अवस्था) नहीं हूँ, बल्कि मैं वह "द्रव्य" हूँ जिसमें पर्यायें घटित होती हैं। दृष्टि और ज्ञान का अंतर: ज्ञान तो पर्याय और द्रव्य दोनों को जानता है, लेकिन 'दृष्टि' केवल शुद्ध द्रव्य पर एकाग्र होती है। जैसे सुनार गहनों की बनावट (पर्याय) को देखते हुए भी उसकी दृष्टि सोने (द्रव्य) की शुद्धता पर होती है। शांति का उपाय: जब हमारी दृष्टि बदलती हुई परिस्थितियों (पर्यायों) पर होती है, तो दुख होता है। जब दृष्टि अपने ध्रुव और स्थिर स्वभाव (द्रव्य) पर जमती है, तो निराकुल आनंद और शांति की उत्पत्ति होती है।
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