Cover of ध्यान का स्वरूप
Dravyanuyog

ध्यान का स्वरूप

Dhyan Ka Swaroop

by Dr. Hukamchand Bharill

5approx.

* Prices are subject to revision. Delivery fees may vary by location.

Publisher

Pandit Todarmal Smarak Trust

A-4, Bapu Nagar, Jaipur-302015, Rajasthan

Description

ध्यान का स्वरूप (Dhyan Ka Swaroop)

लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर


1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय

'ध्यान का स्वरूप' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी की एक ऐसी कृति है जो 'ध्यान' (Meditation) के नाम पर प्रचलित भ्रांतियों को दूर करती है। डॉ. साहब ने इसमें स्पष्ट किया है कि ध्यान केवल आँखें बंद करके बैठने या किसी ज्योति पर एकाग्र होने का नाम नहीं है, बल्कि अपनी शुद्ध आत्मा में लीन होना ही वास्तविक ध्यान है।


2. मुख्य विषय और वैचारिक बिंदु (Key Highlights)

  1. ध्यान की परिभाषा: एकाग्रता मात्र ध्यान नहीं है (क्योंकि वह तो चोर या शिकारी को भी होती है)। जैन दर्शन के अनुसार, सम्यग्ज्ञान पूर्वक अपनी आत्मा के स्वरूप में एकाग्र होना ही सच्चा ध्यान है।
  2. चार प्रकार के ध्यान: पुस्तक में जैन आगम के अनुसार चार ध्यानों का वर्णन है:
    • आर्त ध्यान: दुख और इष्ट-वियोग में लीन रहना (संसार का कारण)।
    • रौद्र ध्यान: हिंसा और क्रूरता के विचारों में लीन रहना (नरक का कारण)।
    • धर्म ध्यान: तत्त्व विचार और आत्म-स्वभाव में एकाग्रता (मोक्षमार्ग का प्रारंभ)।
    • शुक्ल ध्यान: पूर्ण शुद्धता और वीतरागता की अवस्था (मोक्ष का साक्षात् कारण)।
  3. ध्यान और ज्ञेय: डॉ. साहब समझाते हैं कि ध्यान करने के लिए बाहरी आलंबन की नहीं, बल्कि 'भेद-विज्ञान' की आवश्यकता है। जब 'ज्ञाता' (आत्मा) स्वयं को 'ज्ञेय' (जानने योग्य वस्तु) बना लेता है, तब समाधि घटित होती है।
  4. ध्यान की प्रक्रिया: यह पुस्तक "ध्यान कैसे करें?" का व्यावहारिक मार्गदर्शन देती है। इसका आधार वस्तु स्वातंत्र्य का निर्णय है—जब तक बाहर से मोह नहीं टूटेगा, तब तक भीतर एकाग्रता नहीं होगी।

3. दार्शनिक दृष्टिकोण

डॉ. भारिल्ल इस पुस्तक में एक महत्वपूर्ण सूत्र देते हैं:

"ध्यान कोई क्रिया नहीं है जिसे 'किया' जाए, बल्कि यह वह परिणति है जो आत्म-स्वरूप के 'निर्णय' और 'प्रीति' से स्वतः उत्पन्न होती है।"


4. पुस्तक की विशेषताएँ

  • भ्रांति निवारण: यह पुस्तक उन लोगों के लिए आईना है जो 'प्राणायाम' या 'मंत्र-जाप' को ही अंतिम ध्यान मान लेते हैं।
  • तार्किक शैली: डॉ. साहब ने आचार्य शुभचन्द्र कृत 'ज्ञानार्णव' और आचार्य पूज्यपाद कृत 'इष्टोपदेश' के सार को सरल हिंदी में प्रस्तुत किया है।

5. संदर्भ और उपलब्धता

  • भाषा: स्पष्ट, तार्किक और गंभीर हिंदी।
  • उपयोगिता: ध्यान के अभ्यासुओं और मानसिक शांति की तलाश करने वाले मुमुक्षुओं के लिए।
  • डिजिटल लिंक: Jain eBooks और Atma Dharma पर उपलब्ध।

6. संबंधित साहित्य

  • ज्ञानार्णव: जैन योग और ध्यान का महान ग्रंथ।
  • समाधि तंत्र: आत्म-ध्यान की सूक्ष्म प्रक्रिया के लिए।
  • बिन्दु में सिन्धु: ध्यान के संक्षिप्त सूत्रों के लिए।
Language
Hindi
ISBN
-
Formats
Paperback

Topics

Anekantavada