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बारस अणुवेक्खा (Barasa Anuvekkha) जैन दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना आचार्य कुंदकुंद (लगभग प्रथम शताब्दी) द्वारा प्राकृत भाषा में की गई है। 'अणुवेक्खा' शब्द का अर्थ है 'अनुप्रेक्षा' या 'बार-बार चिंतन करना'। यह ग्रंथ आत्मा के कल्याण और वैराग्य की उत्पत्ति के लिए बारह प्रकार के विशेष चिंतनों का प्रतिपादन करता है।
ग्रंथ में वर्णित बारह भावनाओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:
| अनुप्रेक्षा | मूल अर्थ एवं चिंतन |
|---|---|
| 1. अनित्य | संसार की सभी वस्तुएं, शरीर और संयोग नाशवान हैं। |
| 2. अशरण | मृत्यु और दुखों से बचाने वाला संसार में कोई नहीं है, केवल 'धर्म' ही शरण है। |
| 3. संसार | यह जीव अनादि काल से जन्म-मरण के चक्र में भटक रहा है। |
| 4. एकत्व | जीव अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरता है; सुख-दुख का भोक्ता भी वह अकेला है। |
| 5. अन्यत्व | शरीर और आत्मा पूर्णतः भिन्न हैं; धन-संपदा और परिवार आत्मा से अलग हैं। |
| 6. अशुचि | यह शरीर मल-मूत्र आदि अपवित्र पदार्थों का घर है, इससे मोह करना व्यर्थ है। |
| 7. आस्रव | मोह, राग और द्वेष के कारण आत्मा में कर्मों का आना ही दुखों का कारण है। |
| 8. संवर | तप और संयम के माध्यम से नए कर्मों के प्रवेश को रोकना। |
| 9. निर्जरा | आत्मा में पहले से मौजूद कर्मों को तपस्या द्वारा नष्ट करना। |
| 10. लोक | तीन लोक (ऊर्ध्व, मध्य, अधो) के स्वरूप और उनमें जीव की स्थिति का चिंतन। |
| 11. बोधिदुर्लभ | रत्नत्रय (सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र) की प्राप्ति अत्यंत कठिन और दुर्लभ है। |
| 12. धर्म | जिनेन्द्र देव द्वारा बताया गया अहिंसात्मक धर्म ही परम सुख का मार्ग है। |
आचार्य कुंदकुंद ने इस लघु ग्रंथ में गाथाओं के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि जब तक जीव स्वयं को शरीर से भिन्न नहीं मानेगा, तब तक उसे मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। यह ग्रंथ मुनियों और श्रावकों, दोनों के लिए प्रतिदिन चिंतन करने योग्य है।
### डेटा टैगिंग (Metadata)
- **शीर्षक:** बारस अणुवेक्खा (बारह अनुप्रेक्षा)
- **लेखक:** आचार्य कुंदकुंद
- **परंपरा:** दिगंबर जैन (द्रव्यानुयोग)
- **प्रमुख तत्व:** वैराग्य, संवेग, निर्वेद
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