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आत्मानुशासन (Atmanushasan) दिगंबर जैन परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और वैराग्यपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना आचार्य गुणभद्र (9वीं शताब्दी) ने की थी। आचार्य गुणभद्र वही महान आचार्य हैं जिन्होंने 'महापुराण' के उत्तरपुराण भाग को पूरा किया था। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है—आत्मा + अनुशासन—यह ग्रंथ 'अपनी आत्मा को अनुशासन में रखने' या 'स्वयं को शिक्षित करने' की एक नियमावली है। ग्रंथ की मुख्य विशेषताएं: रचनाकार: आचार्य गुणभद्र। विषय: इसमें कुल 272 श्लोक हैं, जो संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं। शैली: इसकी भाषा अत्यंत मर्मस्पर्शी और काव्यात्मक है। यह ग्रंथ सीधे पाठक के हृदय से संवाद करता है। उद्देश्य: जीव को संसार, शरीर और भोगों की नश्वरता दिखाकर उसे आत्म-कल्याण (मोक्ष) के मार्ग पर लगाना।
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