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Dravyanuyog

अनेकान्त और स्याद्वाद

Anekant Aur Syadvad

by Dr. Hukamchand Bharill

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Publisher

Pandit Todarmal Smarak Trust

A-4, Bapu Nagar, Jaipur-302015, Rajasthan

Description

अनेकान्त और स्याद्वाद (Anekant aur Syadvad)

लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर


1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय

'अनेकान्त और स्याद्वाद' जैन दर्शन के सबसे महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक सिद्धांतों—अनेकान्तवाद (Philosophy of Non-Absolutism) और स्याद्वाद (Theory of Relativity/Perspective)—का एक तार्किक विश्लेषण है। डॉ. भारिल्ल ने इस पुस्तक के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि जैन दर्शन का यह सिद्धांत विश्व-शांति और समन्वय का एकमात्र मार्ग है।


2. मुख्य विषय और अवधारणाएँ (Key Concepts)

क. अनेकान्तवाद (Anekantvad)

  • अर्थ: एक ही वस्तु में अनंत धर्मों (विपरीत दिखने वाले गुणों) का एक साथ मौजूद होना।
  • तत्व: जैसे एक व्यक्ति एक साथ पिता भी है, पुत्र भी और भाई भी। वस्तु में नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों धर्म एक साथ रहते हैं।
  • उद्देश्य: यह सिद्धांत हमारे हठ और एकांत आग्रह (एक ही पक्ष को सही मानना) को समाप्त करता है।

ख. स्याद्वाद (Syadvad)

  • अर्थ: सत्य को कहने की पद्धति। यह अनेकान्त का 'वाच्य' रूप है।
  • स्यात् (Syat): इसका अर्थ "शायद" नहीं, बल्कि "एक विशेष अपेक्षा से" (From a particular perspective) है।
  • सप्तभंगी: किसी वस्तु के बारे में सात प्रकार से अपनी बात कहना ताकि सत्य के सभी पक्षों का ज्ञान हो सके।

ग. समन्वय का मार्ग

  • डॉ. साहब ने इस पुस्तक में दिखाया है कि कैसे दुनिया के सभी विवाद केवल 'एकांत' (आंशिक सत्य को पूर्ण सत्य मानना) के कारण हैं। स्याद्वाद इन विवादों को सुलझाकर समग्र सत्य को देखने की दृष्टि देता है।

3. पुस्तक की विशेषताएँ

  • तार्किक प्रस्तुति: डॉ. भारिल्ल ने जटिल दार्शनिक सूत्रों को आधुनिक उदाहरणों और तर्क के माध्यम से सरल बनाया है।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह पुस्तक सिद्ध करती है कि अनेकान्त केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक वैज्ञानिक सत्य है।
  • अनेकांत का दुरुपयोग: लेखक ने इस पर भी प्रकाश डाला है कि लोग कैसे अनेकांत के नाम पर अपनी गलतियों का बचाव करते हैं और 'सम्यक अनेकांत' क्या है।

4. संदर्भ और उपलब्धता

  • भाषा: शुद्ध, तार्किक और उच्च स्तरीय हिंदी।
  • पाठक: दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी, न्याय के जिज्ञासु और गंभीर पाठक।
  • डिजिटल लिंक: आप इसे Jain eBooks या Atma Dharma पर खोज सकते हैं।

5. संबंधित साहित्य

  • परीक्षामुख: जैन न्याय का आधारभूत ग्रंथ।
  • स्याद्वादमंजरी: स्याद्वाद पर एक विस्तृत प्राचीन टीका।
Language
Hindi
ISBN
-
Formats
Paperback

Topics

Anekantavada