अहिंसा : महावीर की दृष्टि में (Ahimsa: Mahaveera Ki Drishti Mein)
लेखक: डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल (Dr. Hukamchand Bharill)
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट (PTST), जयपुर
1. पुस्तक का संक्षिप्त परिचय
'अहिंसा : महावीर की दृष्टि में' डॉ. हुकुमचंद भारिल्ल जी द्वारा लिखित एक अत्यंत मौलिक और तार्किक कृति है। यह पुस्तक अहिंसा को केवल "किसी को न मारने" तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे भगवान महावीर के अध्यात्म और वस्तु-स्वातंत्र्य के आलोक में परिभाषित करती है। यह पुस्तक सिद्ध करती है कि अहिंसा आत्मा का स्वभाव है।
2. मुख्य वैचारिक बिंदु (Key Highlights)
- अहिंसा की नई परिभाषा: डॉ. साहब आचार्य अमृतचन्द्र के 'पुरुषार्थसिद्धयुपाय' के आधार पर समझाते हैं कि आत्मा में राग-द्वेष और मोह का उत्पन्न होना ही 'हिंसा' है, और इन विकारों का न होना ही 'अहिंसा' है।
- बाह्य बनाम अंतरंग हिंसा:
- बाह्य: किसी जीव के प्राणों का घात करना।
- अंतरंग: अपने स्वभाव को भूलकर विभाव (क्रोध, मान, माया, लोभ) में लीन होना।
- पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि बिना आंतरिक राग-द्वेष के बाह्य हिंसा नहीं होती।
- अहिंसा और वीरता: महावीर की अहिंसा कायरों का मार्ग नहीं, बल्कि महावीरों का मार्ग है। अपनी इंद्रियों और मन को जीतना ही सच्ची अहिंसा है।
- अनेकांत और अहिंसा: वैचारिक अहिंसा का नाम 'अनेकांत' है। दूसरों के विचारों का सम्मान करना और सत्य के अनंत पक्षों को समझना ही 'बौद्धिक अहिंसा' है।
- जियो और जीने दो: इस नारे का मर्म यह है कि जब हम स्वयं को स्वतंत्र और शुद्ध देखते हैं, तभी हम दूसरे जीवों को भी स्वतंत्र और उनके अस्तित्व को स्वीकार कर पाते हैं।
3. दार्शनिक दृष्टिकोण
डॉ. भारिल्ल इस पुस्तक में एक क्रांतिकारी तर्क देते हैं:
"किसी जीव को मारना या बचाना हमारे हाथ में नहीं है (क्योंकि यह उसके आयु कर्म पर निर्भर है), लेकिन दया या क्रूरता का भाव हमारे हाथ में है। वही भाव हमारी अहिंसा या हिंसा का निर्णायक है।"
4. पुस्तक की विशेषताएँ
- तार्किक विश्लेषण: यह पुस्तक रूढ़िवादी मान्यताओं को हटाकर अहिंसा को 'परिणामों की शुद्धता' से जोड़ती है।
- वैज्ञानिक आधार: जीव-दया के साथ-साथ आत्म-दया (स्व-कल्याण) पर विशेष बल दिया गया है।
- सरल भाषा: गहरे दार्शनिक रहस्यों को उदाहरणों के माध्यम से सुगम बनाया गया है।
5. संदर्भ और उपलब्धता
- भाषा: सुबोध, तार्किक और प्रभावशाली हिंदी।
- उपयोगिता: अहिंसा के वास्तविक स्वरूप को समझने और दैनिक जीवन में अपनाने हेतु।
- डिजिटल लिंक: यह Jain eBooks और Atma Dharma पर उपलब्ध है।
6. संबंधित साहित्य
- पुरुषार्थसिद्धयुपाय: अहिंसा के सूक्ष्म विवेचन हेतु मूल ग्रंथ।
- वीतरागी व्यक्तित्व: महावीर के वैराग्य और अहिंसात्मक जीवन के लिए।